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भोपाल के जहरीले कचरे पर जर्मनी में विवाद

३० मई २०१२

भोपाल का जहरीला कचरा जर्मनी में डालने की योजना पर पर्यावरणवादियों और विकास कार्यकर्ताओं की आपत्ति. हाल ही में जर्मनी की एक संस्था ने यूनियन कार्बाइड का कचरा सुरक्षित डिस्पोजल के लिए जर्मनी लाने का प्रस्ताव रखा था.

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तस्वीर: AP

भारत को उम्मीद है कि 350 टन जहरीले कचरे को भोपाल से हटाने में जर्मनी मदद कर सकेगा लेकिन ऐसा संभव होता फिलहाल दिखाई नहीं देता. यह केमिकल कचरा 1984 का है जब यूनियन कार्बाइड कंपनी में गैस रिसाव हुआ था और इसमें कई सौ लोग मारे गए थे.

इस कारखाने के आसपास की जमीन अभी भी दूषित है और यहां करीब 25 से 50 हजार टन जहरीला कचरा जमीन के नीचे दबा है जो लगातार पीने के पानी में जा रहा है. जबकि 350 टन और कचरा जो दुर्घटना से पहले का है वह एक हॉल में रखा है.

जर्मनी की सोसाइटी फॉर इंटरनेशनल को-ऑपरेशन (जीआईजेड) ने इस मामले में मदद देने का प्रस्ताव रखा था. इस क्षेत्र में अनुभवी जीआईजेड की योजना थी कि वह 350 टन जहरीले कचरे का डिस्पोजल जर्मनी के कचरा जलाने वाले प्लांट में करेगा. लेकिन जर्मनी में पर्यावरण संगठनों ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है और साफ शब्दों में कहा है कि जहां का कचरा है उसे उसी देश में निबटाया जाना चाहिए. भारत में आज भी जहरीले कचरे को निबटाने की सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं.

1984 से अब तक अधिकतर पीड़ितों का ही ठीक से पुनर्वास नहीं हो पाया है. भारतीय अदालत ने सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह इस जहरीले कचरे के बारे में कुछ करे. इसके बाद जीआईजेड की ओर भारत सरकार को अपनी पेशकश दी.

जर्मनी में प्रकृति संरक्षण और पर्यावरण संगठन बुंड ने कहा है कि जर्मनी के पांच राज्यों में इस कचरे को जला सकने वाले प्लांट हैं. इस बारे में किसी को शंका नहीं है कि यह हाई टेक प्लांट जहरीले कचरे से प्रभावी तरीके से निबट सकते हैं. कुछ लोगों का यह भी कहना है कि इन संयंत्रों को बनाया ही इसलिए गया है कि कचरे को जला कर पैसा कमाया जाए.

लेकिन बुंड और ग्रीन पीस भोपाल के कचरे को लाए जाने का विरोध कर रहे हैं. बुंड में जहरीले कचरे की जानकार क्लाउडिया बाइटिंगर कहती हैं, "इसे वहीं जलाया जाना चाहिए." ग्रीन पीस में केमिकल विशेषज्ञ मानफ्रेड सानटेन कहते हैं, "हम नहीं चाहते कि इतना जहरीला कचरा आधी दुनिया का सफर कर जहाज से यहां आए."

Bhopal Giftmüll Indien
भोपाल का जहरीला कचरातस्वीर: AP

जर्मनी के पर्यावरणवादियों का मानना है कि जहरीले कचरे को खत्म करने के लिए जरूरी तकनीक वहीं बनाई जानी चाहिए जहां इसकी जरूरत है. जीआईजेड इस तर्क का खंडन करता है. उसका कहना है कि यह तकनीक जटिल है. और जरूरी संयंत्र भारत में लगाने और लोगों को प्रशिक्षण देने में और कई साल लग जाएंगे. इस दौरान कचरा वहीं पड़ा रहेगा और लोग इसके प्रदूषण का शिकार होते रहेंगे.

जर्मन जानकारों का कहना है कि भारत में कचरा जलाने वाले संयंत्र इस जहरीले रासायनिक कचरे को नहीं जला सकते. इन संयंत्रों में कचरा जलेगा तो लेकिन जहरीला धुआं हवा में चला जाएगा, यह केमिकल नष्ट नहीं होंगे. भोपाल में यूनियन कार्बाइड गैस कांड के पीड़ितों के लिए काम करने वाली भोपाल ग्रुप ऑफ इन्फर्मेशन एंड एक्शन की रचना ढींगरा कहती हैं, "भारत में ऐसा कोई संयंत्र नहीं है जो इस तरह के कचरे को जला सके." वह कहती हैं कि जितना कचरा जमीन में है, उसकी तुलना में 350 टन कचरा कुछ भी नहीं है. "लेकिन करीब 28 साल बाद यह कम से कम एक सकारात्मक कदम है. हम इसका स्वागत करते हैं."

जर्मन पर्यावरणवादी बासेल समझौते की ओर इशारा करते हैं जिसमें सीमा पार जहरीले कचरे को भेजने के बारे में नियम है. 1992 में हुए इस समझौते में इस तरह का कचरा भेजा जाना प्रतिबंधित है. 2007 में ऑस्ट्रेलियाई कचरे को दो जर्मन राज्यों ने अपने यहां आने की अनुमति नहीं दी थी.

जर्मन पर्यावरण एजेंसी में मानफ्रेड ग्लाइस कहते हैं कि बासेल समझौता इसलिए किया गया था ताकि जहरीले कचरे को कम कीमत पर अफ्रीका में नहीं फेंका जाए. "यहां जर्मनी में हमारे पास दुनिया के सबसे ज्यादा जानकार हैं जो जहरीले कचरे को ठिकाने लगा सकते हैं."

ये प्लांट सामान्य और ईमानदार डील होने पर बहुत ज्यादा मुनाफा नहीं कमा पाते और जीआईजेड को भी इससे कोई फायदा नहीं होगा. सोसाइटी ने इस पूरी प्रक्रिया के लिए 30 लाख यूरो का बजट बनाया है. जबकि कचरा जलाने और फेंकने की कीमत सिर्फ पांच लाख यूरो है. बाकी खर्चा इसे ट्रांसपोर्ट करने का है.

क्लाउडिया बाइटिंगर यह नहीं मानती कि जर्मन पर्यावरणवादी भारत के साथ सहयोग नहीं कर रहे. लेकिन भारत में जीआईजेड के लिए काम करने वाले कर्मचारियों की झुंझलाहट दिख ही जाती है. एक कर्मचारी कहता है, "मुझे इस बात पर शर्म है कि मेरे घर पर लोग इस देश की मदद करने से हमें रोक रहे हैं. जबकि हमारे पास क्षमता है. मैं जानता हूं कि भोपाल के लोग इससे कितना परेशान हो रहे हैं."

भारत ऐसा देश है जहां कॉलोनियां पहले बनती हैं, सड़कें और नालियां बाद में. वहां फैक्ट्री भी पहले बनती है. उसके बाद सोचा जाता है कि इसका कचरा कहां फेंका जाए. अक्सर नदियां इसका शिकार बनती हैं या फिर आस पास की जमीन. भारत ही इस मुश्किल से जूझ रहा हो ऐसा नहीं है. दुनिया के कई विकासशील देशों में यह एक गंभीर समस्या है.

रिपोर्टः आभा मोंढे (डीपीए)

संपादनः महेश झा