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जर्मनी आएगा भोपाल का जहरीला कचरा

२४ मई २०१२

भोपाल में यूनियन कार्बाइड के कारखाने का जहरीले कचरा अब जर्मनी भेजा जाएगा. भारत ने इस विचार को हरी झंडी दिखा दी है. भले ही सैंकड़ों टन कचरा भेजा जा रहा हो, लेकिन यह कुल कचरे का एक छोटा सा ही हिस्सा है.

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तस्वीर: AP

मध्यप्रदेश गैस पीड़ितों की राहत और पुनर्वास मामलों के मंत्री बाबूलाल गौड़ ने बताया कि सरकार ने जर्मनी के सुझाव को स्वीकार लिया है. जर्मनी की अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए काम करने वाली संस्था जीआईजेड ने कचरे को जर्मनी में दफनाने का प्रस्ताव दिया था. जीआईजेड के प्रवक्ता हांस श्टेलिंग ने कहा कि समझौते पर बातचीत चल रही है, "हमने पिछले कुछ दशकों में इस बात को साबित किया है कि हम इस तरह के कचरे को सही ढंग से दफनाने में सक्षम हैं."

यदि दोनों देशों के बीच समझौता हो जाता है तो 350 टन कचरा जर्मनी भेजा जाएगा. 1984 में यूनियन कार्बाइड के कारखाने में मिथाइल-आइसो-साइनाइड गैस का रिसाव हुआ. इस जहरीली गैस के कारण पंद्रह हजार से अधिक लोगों की जान चली गई. हालांकि रिपोर्टों के अनुसार जिस कचरे को जर्मनी में दफनाने की बात हो रही है वह भोपाल गैस त्रासदी का नहीं बल्कि 1969 से 1984 के बीच अलग अलग तरह के रसायनों के कारण इकट्ठा हुआ.

Unglück in Indien Bhopal 1984
तस्वीर: AP

27 हजार टन जहरीला कचरा

2001 में डाउ केमिकल ने यूनियन कार्बाइड को खरीदा. आलोचकों का कहना है कि यदि कचरा जर्मनी भेज दिया जाता है तो डाउ केमिकल कचरा साफ करने की जिम्मेदारी से बच जाएगा. साथ ही इस बात पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं कि मध्यप्रदेश की राजधानी में 27 हेक्टेयर में फैले इस कारखाने के नीचे जो 27 हजार टन कचरा आज भी दबा हुआ है उसके साथ क्या किया जाएगा. भोपाल गैस त्रासदी के दो दशक बाद भी सरकार कारखाने के जहरीले कचरे से निपट नहीं पा रही है. इंडियन एक्सप्रेस अखबार के अनुसार आज भी भोपाल में जमीन और पानी दूषित है और हजारों लोग इस से जूझ रहे हैं.

इतने सालों में कई बार कचरे को दफनाने पर चर्चा हुई. लेकिन पर्यावरणविदों ने सेहत पर बुरे असर को देखते हुए इन्हें खारिज कर दिया. जीआईजेड के साथ बातचीत पर गौड़ ने बताया, "मंत्रियों के दल ने आठ जून को होने वाली अगली बैठक के लिए जीआईजेड से विस्तार में प्रस्ताव देने को कहा. उसके बाद सरकार तय करेगी कि इस पर कितना खर्चा आएगा और इसे कैसे किया जाएगा." अब तक चल रही बातचीत के अनुसार यह कचरा उत्तरी जर्मनी के शहर हैम्बर्ग के पास दफनाया जाएगा.

आईबी/एएम (डीपीए)