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औसत बारिश के बावजूद भारत के किसान क्यों है परेशान

२० जुलाई २०२३

देश में कम बारिश की चिंताओं के बीच औसत मॉनसूनी बारिश का होना, राहत की बात है. हालांकि इससे खेती की दिक्कतें कम नहीं होती क्योंकि हर जगह एक जैसी बरसात नहीं हो रही है.

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भारत में औसत मॉनसूनी बारिश हुई है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि स्थिति सब जगह एक जैसी रही है
भारत में औसत मॉनसूनी बारिश हुई है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि स्थिति सब जगह एक जैसी रही हैतस्वीर: Raminder Pal Singh/AA/picture alliance

जून महीने में मॉनसून की शुरुआत से अब तक भारत में औसत बारिश हुई है. पहले इस बात की चिंता थी कि अल नीनो के प्रभाव से शायद इस बार बारिश कम हो. मॉनसून की शुरुआती धीमी चाल से जून के दो हफ्ते में बरसात काफी कम रही लेकिन आखिरी हफ्ते में हुई धुआंधार बारिश ने उस कमी को पूरा कर दिया. औसत मॉनसूनी बारिश किसानों के लिए अच्छी खबर है लेकिन बारिश का असमान होना एक नई चिंता बन कर उभरी है. अनियमित बारिश का असर बोई गई उपज पर होता है और किसानों के लिए यह बड़ी मुश्किल है कि बुवाई के बाद फसल को कैसे बचाएं. 

कम बारिश से महाराष्ट्र और कर्नाटक के गन्ना किसानों को अपनी फसल के बर्बाद होने का डर सता रहा है
कम बारिश से महाराष्ट्र और कर्नाटक के गन्ना किसानों को अपनी फसल के बर्बाद होने का डर सता रहा हैतस्वीर: Manish Swarup/AP Photo/picture alliance

असमान वितरण

कुछ उत्तरी और उत्तर-पश्चिमी राज्यों में बहुत ज्यादा बारिश हुई है जबकि दक्षिणी और पूर्वी इलाके सूखे पड़े हैं. भारतीय मौसम विभाग के मुताबिक देश के केवल एक-तिहाई हिस्से में ही औसत बारिश हुई है. अब तक पूरे भारत के 34 फीसदी हिस्से में कम बरसात हुई है जबकि 32 प्रतिशत इलाका बेहिसाब बारिश से जूझ रहा है. हरियाणा, पंजाब, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान में सामान्य से दोगुनी बरसात हुई लेकिन झारखंड, बिहार, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और केरल में 41 फीसदी कम बारिश हुई है.

भारत: कई राज्यों में भारी बारिश, बाढ़ से बुरा हाल

खरीफ फसलों पर असर

धीमी शुरुआत के बाद पिछले पंद्रह दिनों के भीतर चावल, कपास, तिलहन और दलहन की खेती ने जोर पकड़ा है. हालांकि पिछले साल के मुकाबले यह अब भी कम ही है. पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश में भारी बारिश ने रोपे गए धान को बर्बाद कर दिया है. कई किसानों को दोबारा रोपाई करनी पड़ सकती है. दूसरी तरफ, कई राज्यों में कम बारिश की वजह से चावल, मक्का, कपास सोयाबीन, मूंगफली और दालों की बुवाई में देरी हुई है. इनमें महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार और पश्चिम बंगाल हैं. महाराष्ट्र और कर्नाटक के गन्ना किसान भी परेशान हैं कि फसल के तैयार होने के अहम वक्त पर कम बरसात उत्पादन पर बुरा असर डाल सकती है. 

कई राज्यों में बरसात की कमी के कारण फसलों की बुवाई में देरी हुई है
कई राज्यों में बरसात की कमी के कारण फसलों की बुवाई में देरी हुई हैतस्वीर: DW

ज्यादा प्रभावित फसलें

चावल, सब्जियां और दालें भी अनियमित बारिश से प्रभावित हुई हैं. उत्तर में धान के खेत पिछले एक हफ्ते से पानी में डूबे हैं जिससे रोपे गए पौधे तबाह हो गए हैं. किसान मजबूर हैं कि पानी उतरने का इंतजार करें ताकि दोबारा पौधे खेत में लगाए जा सकें. चावल उगाने वाले दूसरे मुख्य राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल, बिहार, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में किसानों ने धान की नर्सरी का सहारा लिया लेकिन कम बारिश की वजह से उन्हें नर्सरी से निकालकर खेतों में लगाना मुमकिन नहीं हो पाया है. सरकारी चावल खरीद का मूल्य बढ़ने के बाद उम्मीद की जा रही थी कि चावल उगाने वाले क्षेत्र का विस्तार होगा लेकिन अब अधिकारी अनुमान लगा रहे हैं कि इसमें कुछ कमी आ सकती है. 2022 के मुकाबले किसानों ने अब तक 6 फीसदी कम क्षेत्र में चावल लगाया है.

सब्जियां जैसे टमाटर, बैंगन, शिमला मिर्च और पालक पर भी बरसात के असमान वितरण का असर पड़ा है. खेतों में खड़ी फसलें बाढ़ से बर्बाद हो गई हैं जबकि दक्षिण भारत में रोपाई में देरी हुई है. नतीजा यह है कि टमाटर जैसी आम सब्जियों के दाम भी उछलकर रिकॉर्ड छू रहे हैं. भारत में शाकाहारियों के लिए प्रोटीन का बड़ा स्रोत है दालें जिनकी बुवाई में भी देरी हुई है. दालें बरसात पर निर्भर हैं और देरी से उनकी उपज भी कम रहने का डर है.

बुवाई में देरी का मतलब

भारत में बुवाई जुलाई के दो हफ्ते बीतने के बाद हो तो इसका मतलब है कि उत्पादन कम होगा. जैसे ही सितंबर का महीना आता है, कई इलाकों में तापमान बढ़ने लगता है जिससे फसल में दानों के प्रस्फुटित होने और पकने की प्रक्रिया पर बुरा असर पड़ सकता है. मौसम विभाग का कहना है कि अल नीनो की वजह से अगस्त और सितंबर महीने में बारिश कम हो सकती है. इस वक्त फसलें पकने के दौर में होती हैं और उन्हें ज्यादा नमी की जरूरत होती है. उस वक्त कम बारिश होने का मतलब है कम उत्पादन.

खेतों में तैयार रबी की फसल पर मौसम की टेढ़ी नजर

रबी फसलों का हाल

गर्मियों में फसल देर से लगने का मतलब है कि कटाई देरी से होगी. यानी सर्दी के मौसम में भी गेहूं और चने जैसी फसलों की बुवाई समय पर नहीं हो पाएगी. रबी फसलों के लिए सर्दी बहुत जरूरी है लेकिन पिछले कुछ सालों में बढ़ते तापमान ने भी उपज पर बुरा असर डाला है. अनुमान यह है कि इस बार सर्दियों में अल नीनो का जोरदार प्रभाव होगा. इसका मतलब यह है कि तापमान सामान्य से ऊंचा रहने की संभावना है जिससे गेहूं की फसल पर नकारात्मक असर पड़ सकता है. पिछले एक साल से भारत गेहूं की कीमतों पर काबू रखने के लिए संघर्ष कर रहा है और आने वाले सीजन में कम उपज मुश्किलें बढ़ा सकती हैं.

एसबी/एनआर(रॉयटर्स)

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