1. कंटेंट पर जाएं
  2. मेन्यू पर जाएं
  3. डीडब्ल्यू की अन्य साइट देखें
समाज

एंटीबायोटिक खाने में सबसे आगे भारत

१ सितम्बर २०१४

औसत भारतीय साल भर में एंटीबायोटिक की करीब 11 गोलियां खाता है. डब्ल्यूएचओ के मुताबिक एंटीबायोटिक का ज्यादा इस्तेमाल नुकसान पहुंचा सकता है.

https://p.dw.com/p/1D3lW
Symbolbild - Antibiotika
तस्वीर: Fotolia/Nenov Brothers

विश्व संवास्थ्य संगठन की चेतावनी के मुताबिक अगर आज इसे रोका नहीं गया तो कल बहुत बड़ी समस्या खड़ी हो सकती है. 2011 में संगठन ने दुनिया भर की सरकारों से अपील की थी कि वे एंटीबायोटिक के इस्तेमाल को नियंत्रित करने के लिए कदम उठाएं.

2014 में भारत में स्थिति और भी खराब पाई गई. 2010 में भारत में 12.9 अरब यूनिट एंटीबायोटिक इस्तेमाल की गई. 2001 में खपत आठ अरब यूनिट थी. लैंसेट में छपी रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में इस्तेमाल हो रही एंटीबायोटिक की 76 फीसदी खपत ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका में है.

एंटीबायोटिक का इस्तेमाल बैक्टीरिया और वायरस जैसे सूक्ष्म जीवों से लड़ने के लिए किया जाता है. लेकिन इनके अत्याधिक इस्तेमाल से बैक्टीरिया में एक खास तरह की प्रतिरोधी क्षमता पैदा हो जाती है जिसके चलते बाद में इन दवाओं का उन पर असर बंद हो जाता है. दवा प्रतिरोधी बैक्टीरिया के कारण हर साल करीब 25,000 मौतें केवल यूरोप में हो रही हैं. पश्चिमी देश इस खतरे को गंभीरता से ले रहे हैं.

जुलाई में ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने चेतावनी दी थी कि बैक्टीरिया के प्रतिरोधी क्षमता प्राप्त कर लेने से हम वापस उस युग में जा सकते हैं जब हम दवाओं के मामले में इतने सफल नहीं थे. भारत में बदलती जीवनशैली के चलते दवा खा लेना लोगों के बीच बड़ी आम बात हो गई है.

समस्या की जड़

प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी में रिसर्च स्कॉलर एवं लेक्चरर रामानन लक्षमीनारायण के मुताबिक भारत के एक तबके में एंटीबायोटिक के बढ़ते इस्तेमाल की वजह है लोगों की बढ़ती आमदनी. वे आसानी से दवाएं खरीद सकते हैं. दूसरी बड़ी वजह है इन दवाओं का पर्चे के बगैर दवाखानों से मिल जाना. डॉक्टर भी बड़ी आसानी से मरीजों को एंटीबायोटिक दवाएं लिख देते हैं. एक और वजह है भारत में संक्रमण की ज्यादा संभावनाएं. लेकिन उन्हें दवाओं से नहीं बल्कि साफ सफाई से रोकने की जरूरत है. उन्होंने कहा, "लोग यह भूल जाते हैं कि एंटीबायोटिक का भी साइड इफेक्ट हो सकता है और कुछ समय बाद वे असर करना भी बंद कर सकती हैं."

भारतीय जन स्वास्थ्य विभाग के डॉक्टर सुरजीत घोष के मुताबिक कुछ मरीज तो डॉक्टर की सलाह लिए बगैर ही एक ही पर्चे पर बार बार दवाएं खरीदते रहते हैं ताकि वे डॉक्टर की फीस से बच सकें. भारत में स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं पश्चिमी देशों के मुकाबले काफी पिछड़ी हैं. औसतन 1700 मरीजों पर एक डॉक्टर उपलब्ध है. 29 फीसदी से ज्यादा आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन बिता रही है.

ऐसी स्थिति में भी इस बात को भी नहीं भुलाया जा सकता कि बिना डॉक्टरी सलाह के बार बार एंटीबायोटिक खाना ऐसे बैक्टीरिया के तैयार होने में मदद कर रहा है जिस पर दवाओं का असर न हो. लक्ष्मीनारायण ने कहा, "हमारे यहां संक्रमण की दर इतनी ज्यादा है कि हम विकसित देशों के मुकाबले कहीं ज्यादा एंटीबायोटिक पर निर्भर होते हैं. इसलिए हमारे यहां इस तरह के ड्रग प्रतिरोधी बैक्टीरिया के भी विकसित होने की ज्यादा संभावना है."

एसएफ/ओएसजे (आईपीएस)