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फ्रांस में तटस्थ वोटरों से परेशान पार्टियां

Priya Esselborn१३ अप्रैल २०१२

फ्रांस में राष्ट्रपति चुनाव के एक सप्ताह पहले सब की नजरें जनमत सर्वेक्षणों की ओर हैं. एक तिहाई मतदाता वोट देने नहीं जाना चाहते हैं. वोट न देने वालों की यह संख्या चुनाव नतीजे को अनिश्चित बना रही है.

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तस्वीर: dapd/AP

महीनों से जनमत सर्वेक्षणों में चुनाव के पहले चरण में सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार फ्रांसोआ ओलांद के जीतने की भविष्यवाणी की जा रही है. लेकिन एक तिहाई मतदाता यदि सचमुच वोट देने नहीं जाते हैं तो चुनाव का नतीजा कुछ भी हो सकता है. इन मतदाताओं को लुभाने के लिए और उन्हें मतदान केंद्र तक लाने के लिए व्यापक अभियान चलाया जा रहा है. सोशलिस्ट कार्यकर्ता घर घर जाकर लोगों से वोट देने को कह रहे हैं.

ओलांद ने पार्टी कार्यकर्ताओं को चेतावनी देते हुए कहा है, "यदि मतदान न करने वालों की संख्या ज्यादा रहती है, तो सभी सर्वेक्षण बेमानी हैं. मैं यह बात जोर देकर कहना चाहूंगा." 22 अप्रैल को फ्रांस में राष्ट्रपति चुनाव का पहला चरण है. और पहले चरण से पहले मतदाताओं का मन चंचल हो रहा है. वे तय नहीं कर पा रहे हैं कि क्या करेंगे. ओलांद ने कहा है, "कुछ भी तय नहीं है." उनकी राय में वामपंथी मतदाताओं में विभाजन से भी बड़ा खतरा इस बात का है कि लोग वोट देने नहीं जाना चाहते. उन्होंने अपने समर्थकों को चेतावनी दी है कि दूसरे चरण में जाना उतना तय नहीं है जितना कहा जा रहा है.

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के चुनाव प्रचार की तर्ज पर फ्रांसीसी समाजवादियों ने देश भर में एक्शन टीम बनाया है जो खासकर समस्याजनक इलाकों में असंतुष्ट और हार मान चुके मतदाताओं को रिझायेंगे. लक्ष्य महात्वाकांक्षी है. एक्शन टीम के सदस्य 50 लाख घरों में जाएंगे. अब तक वे 20 लाख परिवारों से मिल चुके हैं. समाजवादियों की एक चिंता यह भी है कि लेफ्ट फ्रंट के उम्मीदवार जां लुक मेलेंचों को इस बीच उनके धुआंधार चुनाव प्रचार के कारण 15 फीसदी मतदाताओं का समर्थन मिल रहा है. ओलांद और राष्ट्रपति निकोला सारकोजी जनमत सर्वेक्षणों में 27-29 प्रतिशत मतों के साथ लगभग बराबर हैं.

चुनाव रणनीति के विशेषज्ञों की एक चिंता यह भी है कि मध्य मार्च के बाद वोट न देना चाह रहे मतदाताओं की संख्या बढ़ रही है. लोगों की राय जानने वाली संस्था इफोप के फ्रेडरिक डाबी इसे अत्यंत आश्चर्यजनक बताते हैं क्योंकि सामान्य रूप से चुनाव प्रचार के दौरान वोट देने वालों की संख्या बढ़ती है. इसकी वजह यह है कि चुनाव प्रचार में आप्रवासन पर जोर दिया जा रहा है लेकिन फ्रांसीसियों की रोजगार और रोजमर्रे के लिए उपलब्ध धन जैसी चिंताओं को किनारे कर दिया गया है. 

फोंडापोल फाउंडेशन के राजनीतिशास्त्री डोमिनिक रेनी भी चुनाव के पहले चरण में अप्रत्याशित नतीजे को संभव मानते हैं. उनका कहना है कि बहुत मतदाताओं ने तय नहीं किया है कि वे वोट देने जाएंगे या नहीं. उनके अलावा ऐसे मतदाता भी हैं जिन्होंने अभी तक यह तय नहीं किया है कि वे किस उम्मीदवार को वोट देंगे. बहुत से लोग यह भी कह रहे हैं कि यह चुनाव सारकोजी विरोधी चुनाव है. लेकिन राष्ट्रपति निकोला सारकोजी की सत्ताधारी यूएमपी पार्टी का कहना है कि "अभी कुछ भी संभव है." सारकोजी की  चुनाव टीम के सदस्य जिलोम पेल्टिये के अनुसार अभी तक अनिश्चित मतदाताओं की संख्या डेढ़ करोड़ है. फ्रांस में कुल सवा चार करोड़ मतदाता हैं.

समाजवादियों के बीच इस तरह की स्ख्या से पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं. 2002 के चुनाव में समाजवादी उम्मीदवार लियोनेल जोस्पां पहले ही चरण में मुकाबले से अप्रत्याशित रूप से बाहर हो गए थे, जबकि जनमत सर्वेक्षणों में इसका संकेत भी नहीं मिला था. उनसे ज्यादा वोट पाकर उग्र दक्षिणपंथी उम्मीदवार जां मारी ले पेन दूसरे चरण में राष्ट्रपति जाक शिराक का मुकाबला करने पहुंचे. रेनी कहते हैं कि 21 अप्रैल 2002 को हुए चुनाव में रिकॉर्ड 28 फीसदी लोगों के मत न देने के कारण ऐसा हुआ. उस बार विरोध करने वाले मतदाताओं के बदले उदारवादी मतदाताओं ने वोट न देने का फैसला किया था. इसके विपरीत 2007 के चुनाव में वोट न देने वाले मतदाताओं की संख्या 16 प्रतिशत थी.

सारकोजी की चुनाव नीतिकार पैट्रिक बुसौं ने कंजरवेटिव धड़े को शांति रहने की सलाह दी है. उनका कहना है कि दूसरे चरण में वोट न देने वालों की संख्या का सर्वेक्षण संस्थाओं द्वारा किया गया आकलन पूरी तरह बेमानी है. इसलिए सर्वेक्षण में ओलांद की बढ़त बालू का महल जैसा है. बुसौं का कहना है कि चित्रकारी में इसे मृग मरीचिका कहते हैं.

एमजे/एनआर (एएफपी)

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