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दुनिया

टीवी गेम शो में 'यातना' बनी खेल

फ़्रांस में एक डॉक्यूमेंट्री में दिखाया गया कि एक ''टीवी गेम शो'' में खिलाड़ी के ग़लत जवाब देने पर दर्शक उसे 'बिजली के झटके' देने के लिए तैयार हो जाते हैं. डॉक्यूमेंट्री में टेलिविज़न रिएलिटी शो के ख़तरे बताने की कोशिश.

गेम शो में यातना

हालांकि यह बिजली के झटके असली नहीं थे पर स्टूडियों में दर्शकों को यह बात नहीं पता थी. एक डॉक्यूमेंट्री के लिए ''फ़र्ज़ी टीवी गेम शो'' बनाया गया और नाम दिया गया ''ज़ोन एक्सट्रीम''. इसमें वो सारी बातें थीं जो एक गेम शो में होती हैं, एक सुंदर मेज़बान, स्टूडियो में बैठे दर्शक और कुर्सियों पर बैठे प्रतिभागी. शो में लगभग 70 लोगों ने हिस्सा लिया. स्टूडियो में दर्शकों से कहा गया कि वे 'शिकार' की भूमिका निभा रहे एक प्रतिभागी से कुछ सवाल करें. ग़लत जवाब देने पर 'शिकार' को वोल्टेज के शॉक दिए जाते थे. हालांकि शॉक असली

नहीं थे और खिलाड़ी की भूमिका अदा कर रहा कलाकार केवल दर्द भरी चीखें निकालने का अभिनय कर रहा था. लेकिन उसे शॉक देने लोगों को यह पता नहीं था कि शॉक असली नहीं थे और वे शॉक देते रहे.

डॉक्यूमेंट्री में इस गेम शो के ज़रिए आम लोगों (दर्शकों) की आज्ञाकारिता और एक ताक़तवर व्यक्ति (गेम शो का मेज़बान) के सामने उनके आचरण का पता लगाने की कोशिश की गई.

डॉक्यूमेंटरी का नाम रखा गया है ''गेम ऑफ डेथ'' यानी ''मौत का खेल''. इसके ज़रिए दिखाने की कोशिश की जाएगी कि टेलिविज़न का लोगों पर कितना प्रभाव है, टेलिविज़न कौन सी हदें पार कर सकता है. फ़िल्म बनाने वाले इस प्रयोग के ज़रिए इस टीवी शो का विश्लेषण करना चाहते हैं. वे दिखाना चाहते हैं कि टेलिविज़न शो का मेज़बान लोगों को किस तरह बिजली के शॉक देने के लिए राज़ी करता है. डॉक्यूमेंटरी बनाने वालों का कहना है कि शो में हिस्सा ले रहे लगभग 80 प्रतिशत लोगों को मेज़बान ने राज़ी कर लिया था कि वे खिलाड़ी को बिजली के करंट दें.

डॉक्यूमेंट्री के प्रायोजक क्रिस्तोफ निक ने कहा कि यह शो व्यक्ति पर नहीं, ताक़त की धारणा पर केंद्रित है. "जब कोई किसी ऐसे व्यक्ति का सामना करता है जो अपनी ताक़त का गलत इस्तेमाल करे, तो वह ताक़तवर आदमी के पूरी तरह अधीन हो जाता है और कुछ भी करने को तैयार होता है."

1960 में येल विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक स्टैनली मिलग्रम ने एक प्रयोग किया जिसमें छात्रों को उनकी याददाश्त बढ़ाने के लिए इलैक्ट्रिक शॉक दिए जाते थे. मिलग्रम ने अपना प्रयोग इस्राएल में नात्सी अफ़सर आडोल्फ आइशमान की सुनवाई के दौरान किया. इसके ज़रिए वे लोगों के आज्ञाकारी स्वभाव की जांच करना चाहते थे. लोग जब एक ताक़तवर व्यक्ति के नियंत्रण में होते हैं और उन्हें कुछ ऐसा करने को कहा जाता है जो उनके ज़मीर के ख़िलाफ़ हो तो उनकी प्रतिक्रिया कैसी होती है?

गेम शो में खिलाड़ियों को यातना और यातना झेलने की क्षमता की तुलना दूसरे विश्व युद्ध में नात्सी शिविरों से की जा रही है. खेल में हिस्सा ले रही सोफ़ी ने कहा कि उसके नाना नानी भी यहूदी थे और उन्हें नात्सी शिविरों में उत्पीड़न का सामना करना पड़ा. उसने कहा, "मैं बचपन से सोचती थी, नात्सियों ने ऐसा क्यों किया. उन्होंने ऐसे आदेश क्यों माने और मैंने इस गेम शो में देखा कि मैं खुद इन यातना भरे आदेशों का पालन कर रही हूं." निक का कहना है कि मिलग्रम के प्रयोग में केवल 62 प्रतिशत लोगों ने आदेशों का पालन किया. टीवी शो में 80 प्रतिशत से ज़्यादा लोगों ने मेज़बान की बात मानी.

रिपोर्टः एजेंसियां/ एम गोपालकृष्णन

संपादनः एस गौड़

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