यूं तो सोने में बहुत गुण हैं, लेकिन अब पता चला है कि वह नैनो मीटर जितने बड़े अतिमहीन छिद्रों वाले स्पंज के रूप में फ़्यूल सेल कहलाने वाली हाइड्रोजन बैट्री की कार्यकुशलता सौ गुना तक बढ़ा सकता है.
हाईड्रोजन गैस को भविष्य का सबसे साफ़ सुथरा ईंधन बताया जा रहा था. उससे चलने वाली कारें और बसें शीघ्र ही सड़कों पर आने वाली थीं. लेकिन इधर कुछ समय से हाइड्रोजन की चर्चा कुछ ठंडी पड़ गई है. इस बीच एक ऐसी खोज सामने आई है, जो हो सकता है वर्तमान गतिरोध को दूर कर दे.
देखा जाए तो यह खोज बहुत नए भी नहीं है. 1920 के दशक में पता चल गया था कि सोने को अत्यंत महीन छिद्रों वाले स्पंज का रूप भी दिया जा सकता है. लेकिन उस समय नैनो तकनीक का नाम किसी ने नहीं सुना था. रसायनशास्त्री युर्गन वीनर बताते हैं, "नैनो आकार के रंध्रों वाली सामग्रियों का महत्व इन दिनों तेज़ी से बढ़ा है. वे ऊर्जा के संचय, ऊर्जा को किसी दूसरे रूप में बदलने, कैटलिस्ट यानी रासायनिक उत्प्रेरक और तथाकथित ग्रीन एनर्जी की दृष्टि से बहुत दिलचस्प बन गए हैं. इसलिए, आजकल उनके शोध पर काफ़ी ख़र्च किया जा रहा है." वीनर अमेरिका में कैलिफ़ोर्निया की लॉरेंस लिवरमोर प्रयोगशाला में काम करते हैं.
स्वर्ण स्पंज कैसे बनता है
सोने में नैनो आकार के छेद करने की सबसे सरल विधि यह है कि सोने और चांदी को गला कर अच्छी तरह मिला दिया जाए. जो मिश्रधातु बनी, उस के साथ किसी ऐसिड यानी अम्ल की क्रिया करने पर चांदी वाले अणु घुल कर अलग हो जाएंगे. बच रहेगा केवल अणुओं के आकार जितने बड़े छिद्रों वाला स्पंज जैसा सोना. लेकिन, अतीत में इस सुनहरे स्पंज में शायद ही किसी की दिलचस्पी होती थी. कोई चार साल पूर्व बाल्टिमोर के जोना अर्लेबाकर ने सोने के इस स्पंज का असली महत्व समझा. वह कहते हैं, "अतीत में उसे सोने के क्षरण का नमूना समझा जाता था. मुझे लगा कि सोने की यह रंध्रता कोई समस्या नहीं, एक विशेषता है."
रासायनिक कैटलिस्ट
सबसे बड़ी विशेषता यह है कि नैनो मीटर आकार के असंख्य छिद्रों के कारण सोने के एक नन्हें से टुकड़े में भी वह सतह बेहद बढ़ जाती है, जो रासायनिक क्रियाओं को प्रोत्साहित करने वाले कैटलिस्ट का काम कर सकती है. अर्लेबाकर ने पहले सोने के स्पंज पर प्लैटिनम की झीनी परत के मेल से हाइड्रोजन वाले फ्यूल सेल से बिजली प्राप्त करने का इलेक्ट्रोड बनाया. इस समय वे फ़्यूल सेल के काम आने वाली ऑक्सीज़न रिडक्शन क्रिया पर काम कर रहे हैं और कहते हैं कि हो सकता है कि हम इस क्रिया की कार्यकुशलता को सोने के स्पंज से सौ गुने तक बढ़ा सकें.
युर्गन वीनर और जर्मनी में ब्रेमन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने विज्ञान पत्रिका साइंस में कुछ समय पहले लिखा कि वे नैनो मीटर जितने बड़े रंध्रों वाले सोने के स्पंज का उत्प्रेरक के तौर पर प्रयोग करते हुए मिथानोल को मिथाइल फॉर्माल्डिहाइड में बदलने में सफल रहे हैं. रसायन उद्योग के लिए यह एक बहुत ही उपयोगी रासायनिक क्रिया है.
टिकाऊ और दीर्घजीवी
इन वैज्ञानिकों ने पाया कि सोने के स्पंज की कार्यकुशलता के लिए चांदी के वे बचे हुए अणु भी कम महत्वपूर्ण नहीं थे, जो सोने को स्पंज बनाने की क्रिया के समय उसके रंध्रों में फंसे रह जाते हैं. स्पंज के रूप में यह कैटलिस्ट काफ़ी टिकाऊ और दीर्घजीवी प्रतीत होता है. उसके निर्माण की प्रक्रिया भी काफ़ी पर्यावरण अनुकूल है. युर्गन वीनर कहते हैं, "इस समय पर्यावरण सम्मत ग्रीन एनर्जी वाली चीज़ें बड़ी लोकप्रिय हैं. नैनो मीटर रंध्रों वाला सोना बहुत-सी रासायनिक क्रियाओं के लिए एक बढ़िया कैटलिस्ट है."
इस बीच रासायनशास्त्री कार्बन के स्पंजों के साथ भी तरह तरह के प्रयोग कर रहे हैं. वे कार्बन के स्पंजों के भीतर भाप की सहायता से प्लैटिनम के नैनो कणों का अत्यंत झीना प्रलेप जैसा लगाते हैं. इस तरह उन्हें सोने से भी मंहगे प्लैटिनम की बहुत थोड़ी-सी मात्रा की ज़रूरत पड़ती है और उनके हाथ लगता है एक बहुत ही कार्यकुशल रासायनिक उत्प्रेरक. यह भी देखा गया है कि इन मंहगी धातुओं के नैनो आकार वाले कण हवा और पानी में कतिपय रसायनों की न्यूनतम मात्रा का सुराग देने वाले सेंसर का भी काम दे सकते हैं.
रिपोर्टः राम यादव
संपादनः ए कुमार