"मन लागो यार फ़कीरी" में तुलसीदास के इस दोहे को पेटर पांके अपने जीवन का सार मानते हैं. पिछले 30 वर्षों से ज़्यादा समय से दक्षिण एशियाई और जर्मन संस्कृति को साथ लाना पेटर के जीवन का हिस्सा बन चुका है.
लंबे सफ़ेद बालों और खादी वस्त्र पहने पेटर गाते हैं और कहानियां सुनाते हैं. चाहे गायन हो या ध्वनि, उनके लिए सभी संगीत है. हाल ही में पेटर पांके को भारतीय जर्मन सोसाइटी की तरफ़ से रबींद्रनाथ टैगोर सांस्कृतिक पुरस्कार से नवाज़ा गया.
1946 में जर्मनी के कोरबाख़ में पैदा हुए पेटर पांके ने अपनी पढ़ाई भारत और चीन के बारे की है. साथ ही अलग अलग धर्मों और संगीत के सुरों में वह अपने आप को ढूंढते रहे हैं. अगर पेटर पांके के शब्दों में कहें तो यूरोपीय संगीत के भूले हुए सुरों को उन्होंने भारत के प्राचीन संगीत ध्रुपद में ढूंढने की कोशिश की. सुरों की दुनिया में पेटर नित नए प्रयोग करते रहे हैं.
नई दिल्ली में जर्मन सांस्कृतिक संस्था मैक्स म्यूलर भवन के अध्यक्ष डॉ श्टेफान ड्रायर बताते हैं कि पेटर किस प्रकार अपने निजी जीवन के ज़रिए उनकी संस्था के लिए एक प्रेरणा साबित हुए हैं. वह कहते हैं, "पीटर पांके की यह बात मुझे बहुत आकर्षित करती है कि वह इतनी आसानी से संस्कृतियों को साथ ला रहे हैं. उनका निजी जीवन हमारे लिए प्रेरणा है. वह अपने निजी जीवन के अनुभवों के दायरे से बाहर निकल कर एक अलग सांस्कृतिक क्षेत्र को परिभाषित करते हैं. वह राजनीति से कहीं ऊपर संस्कृतियों को साथ लाते है. मैक्स म्यूलर भवन का भी यही दायित्व है कि हम संस्कृति के ज़रिए लोगों को साथ लाएं. ऐसे में पेटर पांके हमारे काम के लिए मददगार साबित हुए हैं. हमारे लिए संस्कृतियों की समानताएं, असमानताओं से ज़्यादा दिलचस्प हैं."
ध्रुपद संगीत भारत में एक ऐसी शैली है जो समय के साथ अपना स्थान खोती गई है. ऐसे में पेटर पांके ने ध्रुपद को पश्चिमी जगत में ले जा कर उसे नए सिरे से परिभाषित किया. पेटर बताते हैं कि पिछले दशकों की तुलना में आज ध्रुपद गायकी एक बार फिर अपने मुक़ाम पर पहुंच चुकी है. पेटर के मुताबिक़ ध्रुपद फिर अपने पूरे शबाब पर है.
पेटर पांके का जीवन पश्चिमी और पूर्वी समाज को क़रीब लाने की एक ख़ूबसूरत उदाहरण है. उनके जीवन का एक और मक़सद रहा है जर्मनी को भारत और पाकिस्तान के क़रीब लाना. ऐसे में पाकिस्तान और भारत के कलाकार भी जर्मनी में कई बार एक मंच पर आए. पेटर लगातार पाकिस्तान और भारत के बीच सफ़र करते आ रहे हैं और वे एक प्रकार से दोनों देशों के लोगों को साथ लाने में सफल भी हुए हैं. 1940 के दशक में पश्चिमी जर्मनी मे जन्मे पेटर, पाक-भारत की वर्तमान स्थिति को पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी के बंटवारे से अलग नहीं समझते. एक लेखक, पत्रकार, कंपोज़र, संगीतकार, संगीत विशेषज्ञ, प्रोड्यूसर के रूप में पेटर ने ध्रुपद के अलावा सूफ़ी संगीत सहित मध्य एशियाई संगीत में भी कई वर्षों तक प्रयोग किए हैं.
पेटर पांके खुश हैं कि उनकी बरसों की मेहनत को सराहा गया है. लेकिन जब युवा पीढ़ी उनसे प्रेरणा लेती है तो यह उनके लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं. भारत के मशहूर मलिक ध्रुपद घराने के युवा गायक प्रशांत कुमार मलिक की नज़रों में आज ध्रुपद गायकी की अंतरराष्ट्रीय लोकप्रियता के पीछे पेटर का योगदान अहम है. पेटर पांके के लिए संगीत का सफ़र यहीं समाप्त नहीं होता है. इस वर्ष उन्होंने अफ्रीका के माली देश के संगीत और भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ प्रयोग करने की शुरुआत की है और जल्द ही यह प्रयोग एक अल्बम के रूप में पेश किया जाएगा.
रिपोर्टः सुनंदा राव, नई दिल्ली
संपादनः आभा मोंढे