बेल्जियम के प्रधानमंत्री हैरमन फ़ान रोमपॉय यूरोपीय परिषद के पहले स्थायी अध्यक्ष होंगे और ब्रिटेन की कैथरीन एशटन पहली विदेशमंत्री. डॉयचे वेले के समीक्षक क्रिस्टॉफ़ हासेलबाख़ इसे यूरोप के लिए गंवाया हुआ अवसर मानते हैं.
स्थायी अध्यक्ष की संभावना के साथ लिस्बन संधि ने यूरोपीय संघ को विश्व मंच पर प्रभावकारी तरीक़े से पेश करने की संभावना दी थी. लेकिन हैरमन फ़ान रोमपॉय के मनोनयन के साथ इस संभावना का उपयोग नहीं किया गया है.
इस फ़ैसले के पीछे यह मक़सद नहीं दिखता कि संघ इस पद का वाक़ई बड़ा राजनीतिक लाभ उठाना चाहता है, बल्कि यह एक कोशिश है संतुलन साधने की. वामपंथ और दक्षिणपंथ के बीच, बड़े और छोटे देशों के बीच, पूरब और पश्चिम के बीच, उत्तर और दक्षिण के बीच, महिलाओं और पुरुषों के बीच. परिषद अध्यक्ष और विदेश नैतिक उच्चयुक्त की नियुक्ति में इन सबके बीच संतुलन स्थापित करना था. और जब इतने संतुलन साधने हों तो नतीजे से ज़्यादा उम्मीद नहीं की जानी चाहिए. रोमपॉय अध्यक्ष इसलिए नहीं बने हैं कि वे सर्वोत्तम उम्मीदवार थे बल्कि इसलिए कि उनका सबसे कम विरोध हुआ.
लेकिन ऐसे महत्वपूर्ण पद के लिए यह सही कसौटी नहीं हो सकती. यूरोपीय परिषद का अध्यक्ष बराक ओबामा या हू चिंथाओ के लिए मिस्टर यूरोप है, एक शख़्सियत जिसके साथ ज़रूरत पड़ने पर संपर्क किया जाएगा. क्या कोई गंभीरता से सोच सकता है कि फ़ान रोमपॉय इस भूमिका को निभा पाएंगे? संभवतः वह सबको साथ लेकर चलने वाले और समझौता खोजने वाले होंगे, जो उन्हें होना भी चाहिए.
लेकिन यूरोप में ओबामा के सबसे महत्वपू्र्ण सहयोगी के रूप में उनकी कल्पना नहीं की जा सकती.
अध्यक्ष की ही तरह एक और प्रभावशाली पद और विश्व में यूरोप के चेहरे के रूप में विदेश मंत्री के पद पर ब्रिटेन की कैथरीन एशटन का चुनाव भी कोई बहुत अच्छा नहीं है. ऐसे कोई बात नहीं है कि जिसे लेकर इन दोनों नेताओं की आलोचना की जाए लेकिन करिश्माई व्यक्तित्व की कमी तो दिखती ही है.
सरकारों ने अपने फ़ैसले से जाने या अनजाने में एक भविष्योन्मुखी फ़ैसला लिया है. यूरोपीय संघ भविष्य में भी विश्व मंच पर साधारण भूमिका ही निभाएगा, एक भूमिका जो संघ के आर्थिक वजन से बहुत कम है. वैसे भी अध्यक्ष जितना कमज़ोर होगा, सदस्य देशों के राज्य व सरकार प्रमुख उतने ही प्रभावी तरीक़े से अपनी स्वयं की भूमिका निभा पाएंगे. लेकिन यूरोप अपने व्यापक हितों की रक्षा तभी कर पाएगा जब वह एकता और ताक़त के साथ सामने आए, पदों के मामले में भी. अब इसका उल्टा ही होगा.
एक दिलासा फिर भी है. यह पहला मौक़ा है जब यूरोपीय संघ का अध्यक्ष चुना गया है, आगे जब कभी यह मौक़ा आएगा तो इस बार मिले सबक़ को ज़रूर को ज़रूर ध्यान में रखा जाएगा.
समीक्षाः क्रिस्टॉफ़ हासेलबाख़/महेश झा
संपादनः ए कुमार