ज़रा सोचिए. कार ऐसी बने, जिसमें साइलेंसर न हों. टंकी न हो.. वह बिजली से चल पड़े, पेट्रोल पंपों की जगह बैटरी चार्ज करने के स्टेशन बन जाएं, ठीक मोबाइल फ़ोन चार्ज करने की तरह. सड़कों पर गाड़ियां सरपट दौड़ें और धुआं न उठे.
सपने की कार
इसी सपने को सच करने में जुट गई हैं कार कंपनियां. 2009 में फ्रैंकफर्ट में दुनिया के सबसे बड़े कार मेले में इलेक्ट्रिक कारों के मॉडल छाए हुए हैं. पूरी तरह बिजली से चलने वाले. बस बैटरी चार्ज करो और कार भगा ले जाओ... मशहूर जर्मन कार कंपनी फॉक्सवागन के प्रोफ़ेसर वोल्फ़गांग श्टाइगर बताते हैं कि "अगर हम पचास फ़ीसदी कारों को बिजली से चलने वाली कारों में बदल दें तो इनसे प्रदूषण पर कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा. ख़ास तौर पर बड़े शहरों के सड़कों की तस्वीर बदल जाएगी और ध्वनि प्रदूषण भी बहुत कम हो जाएगा."
बैटरी ही समस्या
लेकिन बैटरी से चलने वाली इलेक्ट्रिक कारों की सबसे बड़ी समस्या इसकी बैटरी ही है. ह्यूंदै मोटर्स के प्रोजेक्ट मैनेजर योख़ेन श्नाइडर बताते हैं "दो तरह की समस्या है. एक तो इसकी क़ीमत और दूसरी कि यह कितनी दूरी तय करेगी. आप अगर हमारी आई टन ड्राइव कर रहे हैं तो बैटरी चार्ज करने के बाद आप डेढ़ सौ किलोमीटर तक जा सकते हैं."
इसके बाद आपको कम से कम पंद्रह मिनट तक बैटरी चार्ज करनी होगी, तब पचासी फ़ीसदी बैटरी चार्ज होगी. वह भी आदर्श परिस्थितियों में. किसी इलेक्ट्रिक स्टेशन पर अगर एक साथ 10 कारें पहुंच जाएं तो बैटरी चार्ज करने में नंबर आते आते घंटों लग जाएंगे.
इलेक्ट्रोनिक गाड़ियों की धूम
सच्चाई मंहगी
इलेक्ट्रिक कारों की कल्पना करना बड़ा अच्छा लगता है लेकिन इसकी क़ीमत की कल्पना बड़ी महंगी साबित होती है. चूंकि ऐसी कारें अभी प्रयोग के स्तर पर हैं और कोई भी कंपनी खुल क़ीमत नहीं बता रही है लेकिन जानकारों का कहना है कि सिर्फ़ बैटरी की क़ीमत ही 15 से 20 हज़ार यूरो यानी लगभग 10 से 14 लाख रुपये की होगी और कार बनेगी कोई 50-60 लाख रुपये की. यानी आम आदमी की पहुंच से बाहर. पर प्रोफ़ेसर श्टाइगर को उम्मीद है कि "बैटरी की क़ीमत जान मारने वाली है. लेकिन मुझे उम्मीद है कि ज़्यादा कारें बनने के साथ बैटरी निर्माता इस पर ध्यान देंगे और एक वक्त ऐसा आएगा, जब हम इसे ख़रीद पाने की हालत में होंगे."
तेल बचा तो बिजली की किल्लत
बैटरी से चलने वाली इलेक्ट्रिक कारें तेल तो बचा जाएंगी लेकिन फिर महसूस होगी बिजली की क़िल्लत. पूरी दुनिया दोबारा इस्तेमाल कर सकने वाली बिजली की तलाश कर रही है और ऐसे में बहुत ज़्यादा कारें अगर बिजली से चलने लगें तो फिर बिजली की कमी खल सकती है. सौर ऊर्जा के अलावा परमाणु ऊर्जा से बिजली मिल सकती है लेकिन जर्मनी जैसे देश परमाणु संयंत्र बंद कर रहे हैं यानी बिजली की समस्या बहुत जटिल होगी. इसके अलावा जगह जगह इलेक्ट्रिक स्टेशन लगाना आसान नहीं होगा. अभी तक जिन कारों पर काम चल रहा है, उनकी स्पीड बहुत ज़्यादा नहीं है और घंटे दो घंटे के बाद उन्हें चार्ज करने की ज़रूरत होती है. लंबे सफ़र में यह सब मूड ख़राब करने के लिए काफ़ी होगा.
रेनॉं के महत्वाकांक्षी लक्ष्य
भारतीय कंपनी महिन्द्रा के साथ गठजोड़ कर चुकी फ्रांसीसी कार कंपनी रेनॉ ने तो इलेक्ट्रिक कारों के लिए महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय कर दिए हैं. वह फ़्रैंकफ़र्ट मेले में ऐसे चार मॉडल लेकर आई है. वह इस प्रोजेक्ट पर चार अरब यूरो यानी लगभग 300 अरब रुपये झोंक रही है और दो हज़ार बारह तक इन्हें सड़कों पर उतार देगी. आउडी भी उसी साल इलेक्ट्रिक कार लेकर आना चाहती है, जबकि फ़ॉक्सवागन दो हज़ार तेरह में अपनी इलेक्ट्रिक कार ईअप जनता को सौंपना चाहती है.
बैटरी की समस्या
बीच का रास्ता चाहिये
लेकिन पहले के टेस्ट और इलेक्ट्रिक कार के इतिहास को देखते हुए लगता है कि सीधे बैटरी से चलने वाली कार की तैयारी करना एक बार में दो सीढ़ी चढ़ने जैसा है. कारों के जानकार मानते हैं कि बीच का रास्ता निकालना चाहिए. जानकारों कहते हैं कि अगले दस साल में सिर्फ़ दस फ़ीसदी कारें ही बिजली से चलने वाली बन पाएंगी. पहले ऐसी हाइब्रिड कार चलानी चाहिए, जो बिजली और तेल दोनों से चले. योख़ेन श्नाइडर कहते हैं. अभी हम इलेक्ट्रिक कारों के बेहद मज़ेदार मोड़ पर खड़े हैं. अभी आप एक इलेक्ट्रिक कार नहीं ख़रीद सकते लेकिन दो तीन साल में बात बन सकती है.
कई कारें हाइड्रोजन को भविष्य बनाने की कोशिश कर रही हैं. वैसे हाइड्रोजन कारों पर हुए परीक्षण भी कभी पूरी तरह सफल नहीं हो पाए. यानी फ़्रैंकफ़र्ट के मेले से सड़क पर आने में ऐसी कारों को अभी वक्त लगेगा, पर कितना ये पता नहीं.
रिपोर्ट: अनवर जे अशरफ़, फ्रैंकफर्ट
संपादन: आभा मोंढे