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दुनिया

क्यों नाराज़ हैं जर्मन युवा!

हर पीढी की अपनी समस्याएं और मुद्दे होते हैं. जर्मनी में 1968 में जन्मी पीढी ने अपने मां-बाप और उनके नाज़ी इतिहास के खिलाफ आवाज़ उठाई. आज की पीढ़ी ख़फ़ा है कि उन्हें ख़राब पर्यावरण व लचर सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था मिली है.

जर्मन में कई युवाओं को लगता है कि समाज में हर तरह के बोझ को उचित ढंग से बांटा गया है. एक युवती कहती है, "कभी कभार मुझे बहुत ग़ुस्सा आता है. ख़ासकर जब मैं उन लोगों को देखती हूँ जो अब 65 साल की उम्र के हैं. यह सही है कि उन्होंने बहुत सालों तक ख़ूब काम किया, उन्होंने शायद युद्ध भी देखा. लेकिन वह लोग अब अपनी पेंशन के साथ मज़े में ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं. और मुझे यह भी नहीं पता कि जब मैं पेंशन पाने लायक होउंगी, तो मैं उस पैसे से मेरा गुज़ारा हो भी पाएगा या नहीं." ऐसी ही राय एक युवक की भी है. वह कहता है, "मैं बुज़ुर्गों को दोष नहीं देना चाहता हूं. लेकिन यह बात सहीं है कि उनके फ़ैसलों की वजह से पर्यवरण को लेकर गंभीर समस्याएं पैदा हुई हैं. यह भी सही है कि जर्मनी घाटे में चल रहा है, इस देश को बहुत कर्ज़ लेना पड़ा है. फिर भी दूसरे देशों से तुलना करें तो हम जर्मनी में बहुत आराम से जी सकते हैं."

25 वर्ष के वोल्फ़गांग ग्रुएंडिंगर ने राजनीतिशात्र की पढाई की है. हाल ही में उनकी तीसरी किताब निकली है. शीर्षक है "युवाओं की क्रांति, कैसे हम पीढियों के संघर्ष से बच सकते हैं." वोल्फगांग ग्रुएंडिंगर बताते हैं, "हमको हमारी नानी या हमारे मां बाप से कोई नफ़रत नहीं है. लेकिन हक़ीकत यह है कि जर्मन समाज में विवाद बढ रहे हैं. उदाहारण के लिए जर्मनी में फ़ैसला लेने वालों के पास जो भी पैसा होता है, उन्हें बहुत ग़ौर से सोचना पडता है कि वह इसे कैसे ख़र्च करें. वे इसे पेंशन में बढोतरी लाने के लिए इस्तेमाल करे, या फिर शिक्षा और पर्यावरण के लिए."

वोल्फ़गांग ग्रुएंडिंगर का मानना है कि जर्मन सांसद सभी फ़ैसले ज़्यादातर बुज़र्ग पीढी की ज़रूरत के अनुसार लेते हैं. आठ करोड़ की आबादी वाले जर्मनी में क़रीब दो करोड़ लोगों की उम्र 65 साल से ज़्यादा है. वे एक बहुत ही महत्वपूर्ण समुदाय है और एक बड़ा वोट बैंक भी है. इसके अलावा वोल्फ़गांग ग्रुएंडिंगर जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण की हालत को देखते हुए चिंतित हैं. वह कहते हैं, "सबसे चिंता वाली बात यह है कि जो हम अपने बच्चों को विरासत में देंगे और जो हमें अपने मां बाप से विरासत में मिला है वह है पर्यावरण आपदा. जब मैं 40 या 50 साल का होउंगा, तब मै इस आपदा को महसूस भी करने लगूंगा. पृथ्वी ज़्यादा गरम होगी, जलवायु में भी बदलाव आएगा. यानी हमें आज वह भुगतना पड़ेगा जिसके लिए बीते हुए कल के फ़ैसले लेने वाले ज़िम्मेदार हैं."

वोल्फ़गांग ग्रुएंडिंगर का कहना है कि पृथ्वी का शोषण किया गया है. कई इलाक़ों में तो पीने के साफ़ पानी की भी कमी है, तो कहीं बाढ़ बढ़ गई हैं. विकसित देशों में ख़ासकर पश्चिमी यूरोप के देशों में या अमेरिका में यह देखा जा सकता है कि कम बच्चों की वजह से समाज बूढ़े ही होते जा रहे हैं. क्या बुज़ुर्ग पीढी को युवाओं की स्थिति पर अफ़सोस है. एक बुज़ुर्ग की राय है, "नहीं. मुझे किसी बात का अफ़सोस नहीं है. क्योंकि आप पीढ़ियों और उनके समस्याओं की तुलना नहीं कर सकते है. सबकी अपनी अपनी चुनौतियां हैं.

मै भी तो अपनी तुलना अपने पिता से नहीं करता हूं जिन्होंने दो युद्ध देखे हैं. मै ख़ुद को किसी चीज़ का दोषी नहीं मानता हूं. बल्कि मुझे बहुत उम्मीद है कि युवा सभी चुनौतियों को पार कर पाएंगे."

वहीं एक बुज़ुर्ग महिला का कहना है कि उन्होंने अपनी ज़िम्मेदारी वाक़ई अच्छी तरह से नहीं निभाईं. वह कहती हैं, "मैं इस बात से बहुत दुखी हूं कि हमने युवाओं को विरासत में कुछ अच्छा नहीं दिया, ख़ास तौर पर पर्यावरण की अगर बात हो. कई मामलों में हम शायद अंधे ही थे जैसे कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद हर कीमत पर अर्थव्यवस्था के विकास में जुटे रहे. उपभोग ही सब कुछ है."

वोल्फ़गांग ग्रुएंडिंगर का मानना है कि जर्मनी में वोट डालने की उम्र को कम करना चाहिए. शायद इससे राजनितिज्ञ युवाओं के मुद्दों पर ज़्यादा ध्यान देने लगेंगे. इस वक़्त जर्मनी में 18 साल की उम्र में ही लोग अपना वोट दे सकते हैं. लेकिन वोल्फ़गांग ग्रुएंडिंगर के अनुसार यह भी ज़रूरी है कि युवा खुद अपनी क़िस्मत को अपनी हाथों में लें और राजनीति में शामिल हों, और अगर किसी बात से ख़ुश नहीं हैं, तो सड़कों पर उतरें, प्रदर्शन करें.वह कहते हैं, "मैं अपनी पीढ़ी से अपील करुंगा कि वह भी अपने हितों की रक्षा की मांग करें और चीज़ें जैसी हैं, उन्हें वैसी ही स्वीकार न करें. इस पीढी को परिवर्तनों के लिए काम करना चाहिए. यह हमारी दुनिया है, हम इसमें जीना चाहते हैं और आज की नीतियों का असर हमे सबसे लंबे समय तक भुगतना होगा."

रिपोर्टः प्रिया एसेलबोर्न

संपादनः ए कुमार

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