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जर्मनी को जानिए

किनारे किनारे राइन के

इतिहास, मिथक, मनोहारी दृश्य या सिर्फ़ एक ख़ामोश लम्हा. जर्मनी में ज़्यादातर लोग नदियों के किनारे सैर करना पसंद करते हैं.राइन नदी के किनारे आप किसी भी अनुभव से रूबरू होते हुए गुज़र सकते हैं. चाहे तो पैदल या फिर साइकिल पर.

कोहरे से ढकी राइन की घाटी

आप साइकिल दौड़ की पीली जर्सी भले ही न जीत पाएं, लेकिन राइन के किनारे साइक्लिंग वाकई एक इनामी अनुभव है. राइन की सैर की कई विलक्षणताएं हैं और यक़ीन मानिए, विश्वप्रसिद्ध साइकिल रेस टुअर दि फ्रांस में लगने वाली ऊर्जा का महज़ एक क़तरा खर्च करके ही आप इन्हें हासिल कर सकते हैं.

टुअर दि फ्रांस नहीं तो टुअर दि राइन ही सही. बात प्रतियोगी रेस की नहीं, उस सफ़र की है, जहां कोई मुक़ाबला नहीं, कोई होड़, कोई कप या जर्सी नहीं. बस, है तो एक अप्रतिम, अविस्मरणीय आह्लाद. इस सैर में आपके पड़ाव हैं ऐतिहासिक रोमन शहर कोलोन, शीत युद्ध के दौर की पश्चिमी जर्मनी की राजधानी बॉन और एक लुभावना समापन यानी कोबलेंस. जहां राइन और मोज़ल दोनों नदियों का लंबे सफर बाद मिलन होता है.

साइकिल: जर्मनी की एक मस्तमौला चाल

साइकिल चलाना जर्मनी में एक शौक है, एक खिलदंड़ी जुनून, एक उत्सव, एक ज़रूरत, एक अधिकार. जर्मनी में मनोरंजन के लिए साइकिल सबसे मुफीद साधन है. मस्ती और मौज़ का ख़ास जर्मन तरीका. राइन के किनारे तीन सौ किलोमीटर लंबा ये घूमता घूमाता दिलक़श सफ़र अपने मोहक नज़ारों के लिए विख्यात है. रास्ते में खेत भी हैं, खलिहान भी, पहाड़ भी हैं और मैदान भी. नदी भी है और धारा भी और बीयर पीने पिलाने के ठिकाने तो हैं ही.

साइकिल एक गंभीर शौक है तो इसके कायदे भी हैं. आखिर जर्मनी में हर चीज़ के लिए क़ानून कायदे तो होते ही हैं. साइकिल चलाने के भी नियम बने हुए हैं. कई रास्तों पर साइकिल चालकों के लिए अलग निर्देशपट्ट हैं और वे जगहें भी दर्शायी गयी हैं, जो इस सवारी के दरम्यान देखी जा सकती हैं.

राइन नदी के किनारे का रूट अपने रूमानी विस्तारों और ऐतिहासिक विरासतों के लिए मशहूर है. राइन के किनारे किनारे चलकर कभी जूलियस सीज़र अपने लाव लश्कर के साथ कोलोन आया था. इन्हीं रास्तों से शासक और उनकी हुकूमतें आईं तो इन्ही रास्तों से चलकर आम लोग और उनका श्रम भी आया.

राइन के इन्ही ऐतिहासिक किनारों पर समय की मुश्किलें, बर्बरताएं और विभीषिकाएं भी दर्ज हैं. किनारे के गावों ने दोनों विश्वयुद्ध भी देखे हैं और प्लेग की महामारियां भी.

खैर, सफ़र पर आगे बढ़ें. कोलोन से शुरू करेंगे तो आपके सामने दो निशान, दो रास्ते हैं. एक “ग़लत” कहलाने वाला रास्ता है, जो दरअसल शुरूआत करने के लिए ज़्यादा उपयुक्त आकर्षण है. जिस रास्ते पर सही का निशान लगा है, वो कोबलेंस को जाने वाले साइकिल चालकों के लिए हैं जहां वाहनों का रास्ता भी पड़ता है.

यदि गलत कहे जाने वाले रास्ते पर आप बढ़े, तो देर सबेर वह जंगल, पार्क और जल कुंडों से होता हुआ पूरा हो जाता है. राइन से यदि आप कोई नाव लें, तो आगे ये रास्ता बॉन से जुड़ जाता है.

सिर्फ़ साइकिल तो नहीं

कैनेडीब्र्युइके पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी की याद में राइन पर बना पुल है. इसे पार कर आप दाख़िल होते हैं लुडविग फॉन बेटोफ़न के शहर बॉन में. आप ऑपेरा हाउस और कंसर्ट हॉल के पास से गुज़रते हैं. बॉन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वाले पश्चिम जर्मनी की राजधानी थी. आगे के सफ़र में द्राख़नफेल्स पहाड़ी का नज़ारा आपको दिखता है. संगीतकार रिशार्द वागनर की एक लोक प्रस्तुति में ज़ीगफ्रीड नाम का एक चतुर साहसी राजकुमार एक ड्रेगन को अपना गुलाम बना लेता है और उसके खून में नहाकर अपराजेय हो जाता है.

आगे रास्त मुड़ता है कोबलेंस की तरफ़, जहां अंगूर के बगान ध्यान खींचते हैं. स्थानीय वाइन का स्वाद चखने के लिए भी यहां विश्राम किया जा सकता है.

यूं तो जर्मनी में साइकिल से सवारी का लुत्फ़ लेने के लिए अनेक जगहें हैं, लेकिन सबसे आदर्श और सबसे दिलचस्प सफ़र माना जाता है कोलोन से कोबलेंस का. इस रास्ते में वो सब कुछ है जिसकी एक सैलानी को, एक साइकिल सवार को, एक यात्री को, एक खोजी को या एक नौसिखिए तक को दरकार रहती है. सुंदर सीनरी, ऐतिहासिक झांकियां, मिथक कथाएं, लोक छटाएं, स्वादिष्ट भोजन, वाइन और बीयर के घूंट, रूमानी ललक, एक खुशी, एक लालसा, एक चाहत. संगीत के ज़रिए कहें तो भारतीय शास्त्रीय संगीत के महान गायक कुमार गंधर्व की किसी मोहक पद गायकी जैसा है ये सफर राइन के किनारे किनारे. ये कोई दौड़ नहीं. ये तो है एक सुहाना सफ़र ज़िंदगी का.

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