दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले के बाद समलैंगिक अधिकारों के लिए काम कर रही संस्थाओं ने इसका स्वागत किया है. लगभग नौ साल से इसके लिए संघर्ष कर रहे नाज़ फ़ाउंडेशन ने ख़ुशी जताई.
भारत में समलैंगिकता के समर्थकों में ख़ुशी
नाज़ फ़ाउंडेशन ने दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले पर ख़ुशी जताते हुए कहा कि यह एक प्रगतिशील फ़ैसला है और समलैंगिकों को अधिकार मिलने के बाद ऐसा लग रहा है, जैसे हम वाक़ई 21वीं सदी में आ गए हैं.
नाज़ फ़ाउंडेशन की संस्थापक अंजलि गोपालन ने कहा, "यह एक बेहद प्रगतिशील फ़ैसला है, जो बराबरी के अधिकार को मान्यता देता है." उन्होंने कहा कि वह धारा 377 को पूरी तरह ख़त्म करने की बात नहीं करतीं लेकिन समलैंगिकों को अधिकार की बात करती हैं. गोपालन ने कहा कि समाज के किसी तबक़े को सिर्फ़ इसलिए अलग-थलग नहीं किया जाना चाहिए कि वे समलैंगिक हैं. "हम धारा 377 को हटाने की बात नहीं करते. हम सिर्फ़ यह कहते हैं कि रज़ामंदी से समलैंगिक संबंधों के मामले को ग़ैरक़ानूनी न रखा जाए."
अदालत में नाज़ फ़ाउंडेशन के मुक़दमे की पैरवी करने वाली वकील महक सेठी ने कहा कि वह अदालत के फ़ैसले का स्वागत करती हैं और उन्हें ख़ुशी है कि बच्चों के साथ सेक्स जैसे मामले में अदालत ने साफ़ निर्देश दिए हैं.
दिल्ली हाई कोर्ट ने जैसे ही अपना फ़ैसला सुनाया, वहां जमा समलैंगिक अधिकारों के लिए काम कर रहे लोगों ने एक दूसरे को गले लगा कर बधाई दी. वे सुबह से ही अदालत परिसर में पहुंचे हुए थे. दक्षिण अफ्रीका की एक महिला नियेन्के इस मौक़े पर अपनी ख़ुशी नहीं छिपा पाई और अदालत ने बाहर निकल कर कहा कि यह बहुत अच्छा हुआ.
उसने कहा, "भारत में अब हमारे देश दक्षिण अफ्रीका के जैसा हो रहा है. हमारे यहां तो समलैंगिकों की शादी भी वैध है."
अमेरिकी शहर शिकागो के ब्रायन भी दिल्ली हाई कोर्ट के पास मौजूद थे. उन्होंने भी इस पर ख़ुशी जताई और कहा, "लोकतंत्र में ऐसे मामलों पर क़ानून बनाने में हमेशा मदद मिलती है. अदालत ने समलैंगिकों को अधिकार दिया है और मैं इस पर बहुत ज़्यादा ख़ुश हूं."
सुप्रीम कोर्ट के वकील और समलैंगिक अधिकारों के कार्यकर्ता आदित्य बंदीपाध्याय ने इसे न सिर्फ़ समलैंगिकों के लिए अच्छा फ़ैसला बताया, बल्कि कहा कि इससे हमारी न्याय व्यवस्था की भी असली तस्वीर सामने आती है.
नाज़ फ़ाउंडेशन के लखनऊ प्रमुख आरिफ़ जफर ने कहा, "मैं समझता हूं कि लंबे वक्त बाद यह एक अच्छी ख़बर है. इतने सारे लोगों की मेहनत आख़िर रंग लाई."
रिपोर्टः एजेंसियां/ए जमाल
संपादनः आभा मोंढे