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'विज्ञान की किताबें बदलने की तैयारी करें'

Priya Esselborn४ जुलाई २०१२

दुनिया के सबसे बड़े प्रयोग के दौरान हिग्स कण के संकेत मिलने के बाद नोबेल पुरस्कार विजेता विज्ञानियों का मानना है कि अब नई भौतिकी लिखने का वक्त आ गया है. किताबों के उन पन्नों को हटाना होगा, जो इस नतीजे से गलत साबित होंगे.

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तस्वीर: 2011 CERN

स्विट्जरलैंड में सर्न की प्रयोगशाला से कोई 400 किलोमीटर दूर लिंडाऊ शहर में नोबेल पुरस्कार विजेताओं का सालाना सम्मेलन चल रहा है, जहां जाने माने भौतिकशास्त्री जमा हैं. सर्न में किए गए रिसर्च पर 1984 का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले इटली के कार्लो रुबिया ने कहा कि यह महाप्रयोग कोई 'तुक्का' नहीं, बल्कि बरसों की कड़ी मेहनत का नतीजा है.

डच वैज्ञानिक सिमोन फान डे मैर के साथ डबल्यू और जेड कण खोजने वाले रुबिया ने कहा, "यह ऐसी खोज है, जो रोज रोज नहीं होती." हालांकि उन्होंने सतर्क किया कि अभी हमारे पास सिर्फ शुरुआती नतीजे हैं और हमें दावे के साथ नहीं कहना चाहिए कि यह वाकई हिग्स कण ही हैं. उन्होंने कहा, "यह निश्चित तौर पर मील का पत्थर है लेकिन इन गणनाओं को पूरा करने में कम से कम तीन महीने लगेंगे."

नोबेल पुरस्कार विजेता का कहना है कि भौतिकशास्त्र की बुनियादी चीजों का पता लग गया लगता है और अब प्रकृति को ही तय करना है कि आगे क्या होगा, "भौतिकी की बुनियादी बातें अब आपके सामने हैं. मुझे नहीं पता कि किताब का अगला पन्ना क्या है. प्रकृति को ही इसका फैसला करने दीजिए."

Dr. Carlo Rubbia Nobelpreisträgertreffen in Lindau
1984 में नोबेल जीतने वाले कार्लो रुबियातस्वीर: DW / Ashraf

सर्न ने इस कण की घोषणा करते वक्त बेहद सतर्कता बरती है. इसके डायरेक्टर जनरल रॉल्फ हॉयर का कहना है कि किसी आम आदमी की तरह बात करते हुए तो वह कह देंगे कि हमने इसे पा लिया लेकिन विज्ञानी के तौर पर अभी और भी बहुत कुछ पता लगाना है.

जर्मन शहर लिंडाऊ में हर साल विज्ञान के नोबेल पुरस्कार विजेताओं का सम्मेलन होता है. इस बार संयोग से फीजिक्स के नोबेल विजेता यहां हफ्ते भर के लिए जमा हैं और इसी बीच सर्न से इस बेहद महत्वपूर्ण प्रयोग की घोषणा की गई.

क्या है हिग्स बोसोन

1960 के दशक में स्कॉटलैंड के विज्ञानी पीटर हिग्स ने इस बात का अंदाज लगाया कि अणुओं और परमाणुओं से भी छोटा कोई कण हो सकता है, जिसमें असीम ऊर्जा होती है. उनके नाम पर ही इस कण का नाम हिग्स कण यानी हिग्स बोसोन रख दिया गया. अणुओं से सूक्ष्म कणों को दो श्रेणी में रखा जाता है, फर्मियोन्स और बोसोन. भारतीय वैज्ञानिक सत्येंद्रनाथ बोस के नाम पर इन कणों को बोसोन कहते हैं. समझा जाता है कि अरबों साल पहले ऐसी ही किसी कण में विस्फोट हुआ, जिसे बिग बैंग कहते हैं. इस विस्फोट के बाद ही ब्रह्मांड की सृष्टि हुई. नई खोज के बाद इन मुद्दों को समझने में बहुत आसानी होगी.

विज्ञान जगत लगभग एक दशक तक इस कण पर बहस करता रहा और आखिरकार 30-40 साल पहले इस कण को खोजने की पहल हुई. सर्न की महाप्रयोगशाला में जब इस महाप्रयोग की शुरुआत हुई, तो पूरी दुनिया में हाहाकार मचा कि इसकी वजह से ब्लैक होल बनेगा और दुनिया खत्म हो जाएगी. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, बल्कि इससे दुनिया के बनने की वजह पता लगती दिख रही है.

दक्षिण एशिया का महत्व

इस पूरे प्रयोग के दौरान जिस बोसोन शब्द का जिक्र हो रहा है वह किसी का नाम नहीं, बल्कि भारतीय विज्ञानी सत्येंद्रनाथ बोस की खोज वाला वह कण है, जो परमाणु या अणु से कहीं छोटा होता है. बसु जर्मन विज्ञानी अल्बर्ट आइंस्टीन के समकालीन थे और भौतिकी की दुनिया उनका नाम बड़े सम्मान के साथ लेती है. यह बात अलग है कि उन्हें नोबेल पुरस्कार नहीं मिला.

बोस के अलावा पाकिस्तान के अब्दुस सलाम का नाम भी हिग्स बोसोन के प्रयोग में बेहद अहम है. पाकिस्तान के लिए विज्ञान का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले सलाम ने 1960 के दशक में ही तय कर दिया था कि प्रोटोन को तोड़ा जा सकता है, जिसमें हिग्स कण का जिक्र था. उन्हें 1979 में नोबेल पुरस्कार मिला. लेकिन पहले पाकिस्तान और बाद में दुनिया ने उन्हें भुला दिया और सलाम ने खामोशी के साथ 1996 में ब्रिटेन में आखिरी सांसें लीं.

David J Gross Nobelpreisträgertreffen in Lindau
लिंडाऊ में डेविड जे ग्रॉसतस्वीर: DW / Ashraf

अंत और शुरुआत

नोबेल पुरस्कार विजेता भौतिकशास्त्रियों का कहना है कि सर्न का यह प्रयोग बेहद एहतियात के साथ पूरा किया गया है और इस बात में कोई शक नहीं कि उन्होंने सभी गणनाओं को बेहद बारीकी के साथ पूरा किया है. प्रयोग में लार्ज हाइड्रोन कोलाइडर में दो प्रयोग एक साथ चल रहे थे और इसमें 10,000 से ज्यादा विज्ञानी लगे थे. दोनों के नतीजे लगभग मिलते जुलते आए हैं. 2004 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले अमेरिकी साइंसदान डेविड जे ग्रॉस इस पड़ाव को भौतिकी के एक युग का अंत और शुरुआत दोनों बताते हैं.

उनका कहना है, "हम आज तक हिग्स के बारे में पता लगाने में नाकाम रहे थे. लेकिन आखिरकार करीब 30 साल की मेहनत के बाद हमारी कोशिश पूरी हो गई दिखती है. इसे लेकर जो उम्मीदें बनी थीं, वे अब साकार हो गई हैं. हम कह सकते हैं कि एक युग पूरा हुआ. लेकिन यह एक शुरुआत भी है. भौतिकशास्त्र की सीमाएं बदलने वाली हैं. नई खिड़कियां खुलने वाली हैं. नई गणनाएं सामने आने वाली हैं. यह नई फीजिक्स के स्वागत का समय है. हमें तय करना होगा कि किन थ्योरियों को फेंक दिया जाए और कौन सी नई चीजों को शामिल किया जाए."

हालांकि ग्रॉस ने भी दावा नहीं किया कि यह वाकई में हिग्स कण ही हैं, "हमें नहीं पता. लेकिन यह बिलकुल वैसा ही दिख रहा है."

गॉड्स पार्टिकल से नाराज

मीडिया में भले ही हिग्स कण को गॉड्स पार्टिकल के नाम पर बेचा जा रहा है लेकिन भौतिक विज्ञानियों के सामने इसका जिक्र आते ही वह बिफर उठते हैं. रुबिया का कहना है, "यह बेहद खराब टर्म है." उनके साथ ही मौजूद नीदरलैंड्स के नोबेल पुरस्कार विजेता मार्टिनस वेल्टमन ने कहा, "लेडरमन ने सिर्फ अपनी किताब बेचने के लिए यह शब्द गढ़ा."

अमेरिकी विज्ञानी और 1988 में नोबेल पुरस्कार जीत चुके लियोन लेडरमन ने 1990 के दशक में हिग्स कण पर किताब लिखी. उनका कहना है कि उन्होंने हिग्स बोसोन को गॉड्स पार्टिकल कहा क्योंकि यह भौतिकी की बुनियाद से जुड़ा तत्व है और फिर भी विज्ञान की पहुंच से बाहर है. हालांकि उन्होंने मजाहिया लहजे में यह भी कहा कि वह इसका नाम 'गॉडडैम पार्टिकल' रखना चाहते थे लेकिन प्रकाशक इस नाम से किताब छापने को तैयार नहीं थे. किताब 1993 में प्रकाशित हुई और खूब बिकी.

CERN Europäische Organisation für Kernforschung
सर्न में महाप्रयोगतस्वीर: 2004 CERN

क्या मिलेगा नोबेल

इस सदी की सबसे बड़ी खोज को नोबेल पुरस्कार तो मिलना ही चाहिए. लेकिन नोबेल जीत चुके विज्ञानियों का कहना है कि फिलहाल सब्र की जरूरत है. रुबिया कहते हैं, "इसमें नोबेल पुरस्कार जीतने की क्षमता है. और हो सकता है कि किसी को इसके लिए नोबेल मिले लेकिन अभी समय लगेगा."

उनका कहना है कि यूं तो प्रयोग के नतीजे ही शुरुआती दौर में हैं और अभी इसकी गणना की जानी बाकी है, उसके अलावा कुछ तकनीकी पहलू भी हैं. नोबेल कमेटी का कहना है कि विज्ञान का नोबेल तीन व्यक्तियों से ज्यादा को संयुक्त रूप से नहीं दिया जा सकता और यहां तो 10,000 से ज्यादा वैज्ञानिक इस प्रयोग में लगे हैं."

रिपोर्टः अनवर जे अशरफ, लिंडाऊ (जर्मनी)

संपादनः ओंकार सिंह जनौटी

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