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पुलिस पर भारी जासूस

१६ जुलाई २०१२

भारी भरकम राज्य का पुलिस महकमा भले ही नंबरों के लिहाज से भारी दिखे पर काम के मामले में बेहद कमजोर है. पुलिस की नाकामियों का असर यह हुआ है कि राज्य में प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसियों की बन आई है.

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तस्वीर: DW

लखनऊ के एक पुलिस थाने से सटे हुए सरकारी आवास में दरोगा कामता प्रसाद ने एक फरियादी महिला को बुलाया और नशे की हालत में उसके साथ ज़बरदस्ती करने की कोशिश की. महिला चीखी-चिल्लाई तो आस पास के लोग इकठ्ठा हो गए.  ये घटना बुधवार की है, दरोगा कामता प्रसाद गुरूवार को गिरफ्तार कर लिए गए. ऐसी पुलिस पर भला कौन भरोसा कर सकता है. कौन महिला ऐसी पुलिस के पास शिकायत लेकर जाने की हिम्मत कर पाएगी. जब ये हाल राजधानी लखनऊ का है तो अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि यूपी में दूसरी जगहों पर पुलिस का रवैया क्या रहता होगा. इसी का नतीजा है कि जब तक मज़बूरी न हो लोग पुलिस के पास जाने से कतराते हैं. जो जाते भी हैं वह पुलिस से आजिज़ आ जाते हैं. क्यूंकि पुलिस मामला हल करने के बजे उसे कुछ और ही मोड़ दे देती है. ऐसे में अपनी परेशानियों से निजात हासिल करने का उनके पास एक ही विकल्प बचता है, 'डिटेक्टिव एजेंसी' यही कारण है कि इन एजेंसियों की मांग दिन पर दिन बढती जा रही है.

लखनऊ में ही एमसीए के छात्र आशुतोष सिंह की मौत को पुलिस ने आत्महत्या बताया . उसके परिजनों ने एक डिटेक्टिव एजेंसी की मदद ली. डिटेक्टिव ने महज़ तीन दिन में ही साबित कर दिया कि आशुतोष की हत्या हुई थी. उसने सबूत भी जुटा दिए और हटाया का कारण भी . नतीजा ये हुआ कि उन्ही सबूतों के आधार पर परिवार वालों ने फिर से एफआईआर दर्ज कराई. नोएडा की शालिनी की शादी अमेरिका के एक शख्स से हुई, बात बिगड़ गई, मुक़दमा दर्ज हुआ तो उसने शालिनी के पीछे डिटेक्टिव लगा दिए. कई दिन तक वे उसका पीछा करते रहे. एक दिन कालोनी की सोसाइटी वालों ने उन्हें पकड़ लिया तो मामला थाने तक पहुंचा. एक घंटे के भीतर ही दिल्ली के बड़े बड़े वकील डिटेक्टिव को बचाने के लिए थाने में मौजूद थे. ल

पुलिस की नाकामियां ही दरअसल इनकी कामयाबी है. राजधानी लखनऊ में पिछले 6 महीनो में हत्या, लूट और चोरी की करीब 1200 वारदातें हुईं. इनमें से पुलिस लगभग सवा तीन सौ मामले ही सुलझा सकी.  पूर्व पुलिस महानिदेशक एस आर दारापुरी का कहना है कि पुलिस के काम में कई तरह की दिक्कत आती है. इन्ही लोगों को विवेचना करनी पड़ती है.  अक्सर पुलिस उदासीन हो जाती है, काम का बोझ भी एक समस्या है. इसलिए लोग प्राइवेट डिटेक्टिव के पास जाने लगे हैं. उनके मुताबिक वह दिन दूर नहीं जब डिटेक्टिव बहुत बड़ी और महत्वपूर्ण कड़ी बन चुकें होंगे. दूसरी तरफ टर्क डिटेक्टिव एजेंसी के मुताबिक सीबीआई या लोकल इंटेलिजेंस के रिटायर लोग उनकी एजेंसी में ज्यादा काम करते हैं. इसलिए उनका काम बहुत प्रोफेशनल ढंग से होता है, इसलिए उनका बाजार बढ़ रहा है.

Indien - Polizei
तस्वीर: DW

प्यार में जासूसी

एक टीवी चैनल ने लायल्टी टेस्ट का ऐसा चस्का पैदा किया कि अब डिटेक्टिव प्यार करने वालों की  भी जरूरत बन गए हैं. गोमतीनगर की शीला को अपने एक ब्वॉय फ्रेंड असलम की जासूसी करवाई और उनका शक सही साबित हुआ. असलम किसी और के चक्कर में था और शीला से भी प्यार का नाटक कर रहा था. मामला यही शांत नहीं हुआ  डिटेक्टिव की मदद से ही शीला ने असलम के खिलाफ धोखाधड़ी की शिकायत भी कर दी. अपनी बेटी के लिए दुल्हे के चाल चलन और उसकी पगार जानने के लिए उसके दफ्तर से जानकारी हासिल करने के लिए भी अब डिटेक्टिव की सेवा लेना आम बात हो चुकी है.

लखनऊ की एक डिटेक्टिव एजंसी से जुड़े समीर के मुताबिक किसी की भी फोन के डिटेल्स निकलवाना तो अब आम बात हो चुकी है. इसके लिए मुंह मांगी कीमत मिल जाती है. समीर का कहना है कि शादी डॉट काम जैसी वेबसाइट से उनकी बातचीत चल रही है. वर और वधु दोनों के लिए डिटेक्टिव पॅकेज भी तैयार किये जा रहे हैं . जो लोग वेबसाइट के माध्यम से शादी तय करते हैं उन्हें उनकी ज़रूरत के मुताबिक जानकारियां कम पैसे में उपलब्ध करा दी जाएंगी. फिलहाल किसी के लिए दो से तीन दिन की लोकल जासूसी की कीमत लखनऊ में 5000 रूपये है. उसके बाद जैसे पैसे वैसा काम. सरकारें भी चोरी चुपके इनकी सेवा लेती हैं. एनआरएचएम घोटाले के सामने आने के बाद डिटेक्टिव की सेवालेने की बात सामने आ चुकी है. लखनऊ में देखते ही देखते दर्जन भर से ज्यादा डिटेक्टिव एजेंसी काम करने लगी हैं. समीर के मुताबिक यूपी में इस वक्त लगभग 70 ऐसी एजेंसी काम कर रही हैं. केवल नोएडा में ही करीब 25 डिटेक्टिव एजेंसियां हैं. 

पुलिस वालो की कमी

महानिदेशक स्तर के 125 पद हैं जिनमें डीजी, एडीजी, आईजी, डीआईजी सभी शामिल हैं. लेकिन इन सवा सौ पदों पर 117 आईपीएस अधिकारी ही तैनात हैं बाकी आठ पद रिक्त चल रहे हैं.  इसी प्रकार एसएसपी, एसपी , एडिशनल एसपी, एएसपी और डिप्टी एसपी के 1156 पद स्वीकृत हैं जबकि इनमें से 939 पदों पर ही अधिकारी तैनात हैं.  इन पदों में प्रदेश पुलिस सेवा यानि पीपीएस अधिकारी भी शामिल है.  इन्स्पेक्टर, एसआई और एएसआई के 19, 948 पद स्वीकृत हैं और 8, 508 कर्मचारी तैनात हैं. एएसआई रंक से नीचे के 3,03,346 पद स्वीकृत हैं जबकि इन पर सिर्फ 1,01, 670 कर्मचारी ही तैनात हैं. इसी का नतीजा है कि अभियोजन के मामले अदालतों में वर्षों तक लंबित रहते हैं क्यूंकि इन्ही पुलिस कर्मचारियों पर जांच का काम भी होता है. ज़ाहिर है कि इनकी कार्यकुशलता प्रभावित होती है.

रिपोर्टः एस वहीद, लखनऊ

संपादनः एन रंजन 

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