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अन्य खबरें

  • Stalinallee 1953

    17 जून 1953

    आजादी के लिए विद्रोह

    हड़ताल, रैलियां और खुला आक्रोश. 17 जून 1953 को जीडीआर के नागरिकों का असंतोष साम्यवादी सरकार के खिलाफ जनविद्रोह के रूप में सामने आया लेकिन सोवियत सैनिकों ने विद्रोह को दबा दिया. यह साफ हो गया कि सोवियत अपने प्रभाव वाले इलाके में विद्रोह बर्दाश्त नहीं करेंगे.

  • Parteikonferenz der SED 1952

    17 जून 1953

    समाजवाद का निर्माण

    राजनीतिक नेतृत्व पर लोगों के गुस्से का एक कारण जीडीआर के अनुसार "समाजवाद का धीमा विकास" था. पार्टी नेता वाल्टर उलब्रिष्ट (बाएं) के नेतृत्व में साम्यवादी एसईडी पार्टी ने जीवन परिस्थितियों में सुधार के लिए जुलाई 1952 में उत्पादन बढ़ाने का फैसला किया था. लेकिन योजना विफल हो गई.

  • Bauern in der DDR 1956

    17 जून 1953

    बाजार में सामान नहीं

    बड़े कृषि संस्थानों के राष्ट्रीयकरण का नतीजा यह हुआ कि खाने पीने की चीजों की कमी हो गई. जीवन परिस्थितियां भी बेहतर नहीं हो रही थीं. सरकार ने हालत सुधारने के लिए काम बढ़ाने के फैसले लिए. लोगों को अधिक काम और ज्यादा उत्पादन करना था. उन्हें लगा कि हालत और बुरी हो जाएगी.

  • Nikita Sergejewitsch Chruschtschow 1960

    17 जून 1953

    नई रणनीति

    उसके बाद तेज बदलाव आया. सोवियत तानाशाह स्टालिन की मौत के बाद निकिता ख्रुश्चोव के गुट ने मॉस्को में सत्ता संभाली. उसने जीडीआर नेतृत्व से बहुत से फैसले वापस लेने को कहा. जून 1953 में जीडीआर ने नई रणनीति तय की लेकिन लोगों का गुस्सा शांत करने के लिए काफी देर हो चुकी थी.

  • Deutschland Geschichte DDR Aufstand 17. Juni Berlin Leipziger Platz

    17 जून 1953

    स्टालिनआले के मजदूर

    लोगों को नेतृत्व के पलटने पर यकीन नहीं था. जून के शुरू में पूरे जीडीआर में विद्रोह की आग भड़क गई. 10 फीसदी काम बढ़ाने पर सबसे ज्यादा गुस्सा था, उसी का सबसे ज्यादा बचाव किया गया. स्टालिनआले कंस्ट्रक्शन साइट के मजदूरों ने अचानक प्रदर्शन किया. हजारों लोग उसमें शामिल हो गए.

  • Volksaufstand in der DDR am 17. Juni 1953

    17 जून 1953

    इस्तीफे की मांग

    अगले दिन 17 जून को मजदूर सुधारों का विरोध करने के बदले सरकार के इस्तीफे, स्वतंत्र चुनावों और एकीकरण की मांग कर रहे थे. मांगे राजनीतिक हो गई थीं. लाखों पूर्वी जर्मन अपने गुस्से को हवा दे रहे थे. सिर्फ मजदूर ही नहीं, समाज के सभी तबके के लोग सरकार विरोधी विद्रोह में शामिल थे.

  • DDR Volksaufstand Leipzig 17.06.1953

    17 जून 1953

    देशव्यापी विरोध

    यह बात कम लोग जानते हैं कि विरोध प्रदर्शन सिर्फ पूर्वी बर्लिन में ही नहीं बल्कि समूचे पूर्वी जर्मनी में हुए. देश के 700 शहरों में लोग सड़कों पर उतर आए, जैसे यहां लाइपजिग में. कहीं-कहीं विद्रोहियों ने कैदियों को जबरदस्ती आजाद करा लिया. राथेनाऊ गांव में भीड़ ने एक कथित मुखबिर की जान ले ली.

  • Deutschland Geschichte DDR Aufstand 17. Juni Berlin Mitte

    17 जून 1953

    विरोध के खिलाफ टैंक

    जीडीआर नेतृत्व ने डर कर बर्लिन-कार्ल्सडॉर्फ में सोवियत सेना के मुख्यालय में पनाह ली तो सोवियत सेना ने अपनी टुकड़ियां सड़कों पर उतार दी. 17 जून से ही सोवियत टैंक पूर्वी बर्लिन और दूसरे शहरों की सड़कों पर गश्त लगाने लगे. हर तरफ कर्फ्यू लगा दिया गया. 50 से ज्यादा लोग मारे गए.

  • Walter Ulbrich

    17 जून 1953

    सत्ता की कीमत

    व्यापक सैनिक हस्तक्षेप कर मॉस्को ने जीडीआर में उलब्रिष्ट गुट की सत्ता बचाने में मदद की. विद्रोह को दबाए जाने के बाद आंदोलनकारियों को सजा देने की शुरुआत हुई. कुछ को तो फांसी की सजा भी दी गई. 15,000 लोगों को गिरफ्तार किया गया. बहुत से लोगों को सालों तक जेल में बंद रखा गया.

  • Berliner danken den sowjetischen Soldaten

    17 जून 1953

    सरकारी प्रचार

    आंदोलनकारियों को सजा दी जा रही थी और जीडीआर नेतृत्व 17 जून के विद्रोह को पश्चिमी खुफिया एजेंटों के निर्देश पर "बहकावे में आए मजदूरों" की कारस्तानी बता रहा था. इस तरह के पोस्टर जारी किए गए जिनमें पूर्वी जर्मनी के लोग सोवियत सैनिकों को गुलदस्ता भेंट कर आभार दिखा रहे थे.

  • Trauerkundgebung an den Särgen der Berliner Opfer

    17 जून 1953

    आजादी के लड़ाके

    पश्चिमी जर्मनी में आंदोलनकारियों को लोकतंत्र का लड़ाका बताया गया. पश्चिम बर्लिन में एक शोक सभा में चांसलर कोनराड आडेनावर ने "आजादी के शहीदों" की बात की. अगस्त 1953 में ही पश्चिम जर्मन सरकार ने 17 जून को एकीकरण दिवस और राष्ट्रीय छुट्टी का दिन घोषित कर दिया.

  • Deutschland Geschichte Kapitel 4 1979 – 1989 Die Mauer fällt Grenzöffnung

    17 जून 1953

    आजादी की चाह

    भले ही 1953 में यह साफ हो गया हो कि सोवियत लोकतंत्र की चाहत को बर्दाश्त नहीं करेंगे, लेकिन चाह का अंत बर्लिन दीवार के गिरने और जर्मन एकीकरण के साथ हुआ. भले ही इसमें 36 साल लग गए हों.


    रिपोर्ट: मारी टोडेसकीनो/एमजे | संपादन: निखिल रंजन